मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

बात एक अनकही सी....गीता का मनोविज्ञान



गीता का मनोविज्ञान
                   मनुष्य के जीवन का तात्पर्य समझना है तो भगवतगीता से अच्छा कोई स्त्रोत्र नहीं हो सकता. बेशक दुनिया के सारे धर्मग्रन्थ चाहे वो बाइबल, कुरान, गुरुग्रंथ साहिब हो अथवा गीता, सब एक ही बात सिखाते हैं,” जीवन में क्या नहीं करना चाहिए”. अब एक बात तो तय है कि हर व्यक्ति के पास बुद्धि और विवेक है और वो ये भी जानता है कि कुछ भी अच्छा करने या बुरा करने से क्या होता है...? “ मुझे ये चाहिए...?” अगर मन में ये बात आ जाये तो फिर मन अधीर हो उठता है, और ये चाहत उसे वो करने को मजबूर कर देती है; जिसे करने को हमारे धर्मग्रन्थ मना करते हैं. “ ये चाहिए”-हमारी पूरी चेतना इसी बिंदु पर केन्द्रित हो जाती है. अब मन ने यक़ीनन उसे पाने की तड़प के रास्ते में रूकावट आने पर क्रोद्धित तो अवश्य होना ही है. और विवेक पर से बुद्धि का नियंत्रण हटना अवश्यंभावी है. फिर पाने की इस चाहत में कुछ मिला तो नहीं अपितु स्वयं अपनी हानि अवश्य कर ली. 




        ‘कुछ चाहिए या नहीं चाहिए’ वास्तव में ‘होने या न होने’ का भ्रम मात्र ही है. इस मन:स्थिति से हम रोज दो-चार होते हैं. समस्या के मूल में यही बात है और हम ये जानते भी हैं पर मन जिद्दी बच्चे की तरह अड़े रहना चाहता है. यही कारण है कि जीवन में हमें वास्तव में क्या चाहिए...? इस बात को सोचने के बदले उन बातों में उलझ जाता है जो उसे जीवन के वास्तविक आनंद से दूर कर देती हैं. यही कारण है कि मानव जीवन जीने के भ्रम में ही अपनी तमाम उम्र गुजार देता है और वो भौतिक वस्तुओं के आस्वादन को ही जीवन का वास्तविक आनंद समझ लेता है. वास्तव में कुछ भी पाने की होड़ में व्यक्ति अपने जीवन के मूल से हट जाता है और जीवन के वास्तविक मूल्यों से परे अपने जीवन के अर्थ तलाशने लगता है. इसी मृगमरीचिका में जीवन रूपी तुरंग भटकता रहता है. जीवन के मूल को समझने की जड़ में यही मतिभ्रम वाली मन:स्थिति इंसान को जीवन के आनंद का रस नहीं लेने देती. चाहत की ये समस्या रिश्तों में भी दिखाई देती है. जबकि होना ये चाहिए की बाह्य संसार याने भौतिकता के प्रति हमारा भाव तटस्थ होना चाहिए याने सांसारिक वस्तुओं के प्रति एक प्रकार की निर्लिप्तता ही हमें जीवन के वास्तविक आनंद से परिचित करवा सकती है.


                      जीवन के प्रति यदि हम तटस्थ रहेंगे तो हम जीवन में वो सब कर सकेंगे जो वास्तव में एक मनुष्य का कर्म है. “कर्म” मानव जीवन का उद्देश्य है. वो इस पृथ्वी पर इसी लिए अवतरित हुआ है. गीता के मूल में ही कर्म योग है और ये कर्म योग तभी संभव है जब हम जीवन के प्रति तटस्थ भाव से सोचें. स्वामी विवेकानंद और शंकराचार्य ने भी जिन चार योगों की बात कही है उनमें कर्म योग सबसे श्रेष्ठ योग है और इसके लिए धार्मिक या अध्यात्मिक होने की आवश्यकता नहीं है. वास्तव में गीता कर्म आधारित जीवन की सर्वश्रेष्ट नियम पुस्तिका है. और इस पुस्तिका के प्रथम अध्याय में ही कृष्ण और अर्जुन के मध्य होने वाले संवाद में मानव मन के संघर्ष रूपी महाभारत का ही विषद वर्णन है. अर्जुन के माध्यम से मानव के “करूँ या न करूँ” या “होने या न होने”  के मानसिक संघर्ष को दर्शाया गया है. गीता सही अर्थों में मानव मन को समझने का मनोविज्ञान है.  (शेष)   
वीणा सेठी.



शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

युवतियों के लिए नए करिअर आप्शन



नये क्षितिज की ओर: ( युवतियों के लिए नए करिअर आप्शन)

              आजकल जब देश का युवा 12वीं करके निकलता है तो आगे क्या कोर्स करूँ ? यही चिंता सताती है और वो जिससे एक शानदार करियर का आगाज कर सके, यही सोचता है. और ये देश की लड़कियों के सामने अधिक परेशान करने वाला होता है क्योंकि उनके लिए सही करिअर चुन पाना आज भी एक समस्या है. तो आइये जाने उनके लिए कुछ करिअर आप्शन:-

1. रेडियो ज़ोकी—आजकल एफ़ एम रेडियो की धूम मची है. इसके लिए आपका एक अच्छा वक्ता होना जरुरी है. आपमें प्रेजेंटेशन स्किल याने अपनी बात को बेहतर तरीके से कहना आना चाहिए. आवाज दमदार हो और उच्चारण साफ़ हो और विषय के हिसाब से आपकी आवाज पर आपका नियंत्रण होना आवश्यक है., अच्छा हो की आप अपना खुद का बोलने का style डेवेलोप करें. बातों को मजेदार व कोमेडी से भरपूर रखने के साथ ही स्थानीय बोली भी आना चाहिए और बॉलीवुड और संगीत की जानकारी के बिना तो रेडियो ज़ोकी तो अधुरा ही मना जायेगा. आर जे बनने के लिए अपनी voice pitch पर जरुर काम करें.


2.एयर होस्टेस- हवाई सपनों और दूसरे देशों कि यात्रा और एक अच्छी सेलेरी के लिए इससे बेहतर करियर आप्शन हो ही नहीं सकता. यात्रियों उनके द्वारा बार-बार बुलाने या  किसी भी तरह के सवाल पूछे जाने पर मुस्कराकर और धैर्य से पेश आना और अपने आप को presentable रखना इस जॉब की आवश्यक शर्त है. आपका प्रेसेंस ऑफ़ माइंड और यात्रियों की जरुरत का हँसते हुए ध्यान रखना और चुनौतीपूर्ण परिस्थिति को सूझबूझ से सम्हालने का टेक्ट आपमें होना जरुरी है. ये जॉब के लिए 12 वीं के बाद अप्लाई किया जा सकता है. इंग्लिश भाषा का ज्ञान खासकर fluently बोलना आना चाहिए और इसके साथ ही कोई दो विदेशी भाषा का पूर्ण जानकार होना जरुरी है.


3. हेयर स्टाइलिस्ट:- ग्लैमर और चकचौंध की दुनिया में करिएर बनने के लिए ये आप्शन चुना जा सकता है. ये एक आर्ट है. इस करिएर को चुनने के लिए आपको बालों के प्रकारों और उसके हिसाब ने उनकी जरूरतों और उनके ट्रीटमेंट की जानकारी होना बेहद जरुरी है. और इसके लिए केमिकल्स, कास्मेटिक्स, हेयर कलर, हेयर कंडीशनर इन सबकी जानकारी और ऐसे प्रोफेशनल काम करना भी आना चाहिए. आपमें creativity का होना बेहद जरुरी है तभी आप चेहरे के लुक के हिसाब से किसी का भी हेयर style और मेकअप कर पायेंगे. इस फील्ड में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को चलने और उनके देखभाल का प्रशिक्षण लेना जरुरी है. इस काम की शुरुआत आप किसी भी हेयर सैलून में बतौर ट्रेनी से कर सकते है. 

4.दुभाषिया-अनुवादक- विदेशी भाषा का जानकार होना करिएर आप्शन के हिसाब से एक शानदार फील्ड है. अनुवादक और इंटरप्रेटर के रूप में काम करने के लिए विभिन्न विदेशी भाषाएं- स्पैनिश, जर्मन, फ्रेंच और चाइनीज की मांग बढ़ती जा रही है. मल्टीनेशनलकंपनी, टूरिज्म, फाइव स्टार होटल्स, एम्बेसी ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ अनुवादक या इन्टरप्रेटर की आज बेहद डिमांड है.

5.मोडलिंग- ग्लैमर से जुड़ी दुनिया में इंटर करने के लिए ये एक अच्छा आप्शन है. इसके लिए पहले किसी स्टाइलिस्ट और fashion फोटोग्राफर से अपना पोर्फोलियो बनवा लें और उसे किसी एड एजेंसी को दें जो आपके प्रोफाइल के हिसाब से आपको मोडलिंग का काम दिलवा सके. मोडलिंग में आपके लिए कई दरवाजे खुले हैं. आप टेलीविज़न मोडलिंग या फिर रैंप मोडलिंग या फिर स्टील मोडलिंग या फिर शोरूम मोडलिंग कर सकती हैं पर इस बात का ध्यान रखें की कहीं ग्लैमर की चमक मेमन आप अपना शोषण न करवा बैठें.

6.इंटीरियर डिजाइनिंग - इसके लिए आपका creative होना पहली शर्त है. घर को नया लुक देने, उसे व्यवस्थित ढंग से रखने और एक तयशुदा बजट में घर को सुंदर और सुरुचिपूर्ण लुक देने का स्किल हो उनके लिए ये एक शानदार करीअर है. इसके लिये अपने आसपास के पर्यावरण, फंगशुई व वास्तु का अच्छा ज्ञान, मनोविज्ञान की अच्छी समझ, ड्राइंग और वास्तुकला का ज्ञान होना जरुरी है क्योंकि इंटीरियर डिजाइनिंग इन सब बातों पर आधारित होती है. इसके लिए देश के संस्थाओं में इंटीरियर डिजाइनिंग का डिप्लोमा और डिग्री कोर्स उपलब्ध है.

7.स्क्रिप्ट्स राइटर- अगर आपमें लेखन की कला है तो इस फील्ड में अपना हाथ आजमा सकते हैं. बेशक ये काम कविता या कहानी लिखने से अलग है और ये एक तरह का कहानी लेखन ही है पर ये फिल्म या टी वी सिरिअल के लिए लिखी जाने वाली कहानी की तकनीकि कला है और इसका प्रबाव इसके फिल्मांकन के बाद ही सामने आता है. स्क्रिप्ट लेखन याने पटकथा लेखन का कोई अलग से कोर्स नहीं होता ये जर्नलिज्म के कोर्स के अंतर्गत आता है. इसमें कम से कम शब्दों में अपनी बात सामने तक पहुंचाने की कला होनी चाहिए ताकि किसी प्रोडक्ट की खूबियाँ सामने वाले या देखने वाले तक आपकी बात पहुंच सके.


8.आर्ट डिज़ाइनर- ये करिअर TV से लेकर फिल्म बनने तक काम आता है, इसे लिए आपका creative होना बेहद जरुरी है. अगर बड़ी मूवीज जैसे रामलीला, देवदास या फिर रामायण या अशोका जैसे TV सीरियल रहे हों सबमें एक बात कॉमन थी और वे थे उनके भव्य सेट. आर्ट या सेट designer का काम यहीं से शुरू होता है. इसके लिए एस्थेटिक सेन्स, रिसर्च स्किल, creative स्किल और फिल्म से सम्बंधित तकनिकी ज्ञान होना आवश्यक है. स्पेस का इस्तेमाल, सेट डिजाईन करना और उसका लेआउट समझना और स्टोरी को विज़ुलाइस करने की क्षमता हो तो सेट या आर्ट डिज़ाइनर सही करिएर आप्शन है.

वीणा सेठी

रविवार, 1 जनवरी 2017

क्षणिकायें-1

क्षणिकायें-1

प्यार
दो लोंगों के बीच
एक एहसास;
तीसरा कभी न
जान पाए वो बात .

दोस्त
वो जो मेरे साथ है,
बगैर ये जाने या पूछे
कि वो क्यों...?
मेरे साथ है.

वक्त
हर घाव का मरहम होता है.
हर दर्द की दवा होता है .

दीपक
जो खुद जलता है
और
दूसरों को रौशनी देता है;
दीपक ही होता है.



स्त्रोत्र-गूगल +

सोमवार, 26 सितंबर 2016

चार लाइन





जिंदगी भर

जिंदगी भर कभी किसी का साथ किसको मिला है.
फिर क्यों इस बात पर जिंदगी भर का गिला है.
आओ चल पड़ते हैं जिंदगी की डगर पर ऐसे;
कि जैसे अपना साया ही अपने साथ चला है.(वीणा)

शनिवार, 20 अगस्त 2016

kavita

दस बजे..........








खामोश है,
शहर की हवा;
धुंए का गुबार सा उठा है;
कोनो-कोनो में.
सायरन की आवाज
चीख़-चीख़ कर रुक जाती है.
सड़क  और गलियों में
 आज सन्नाटे का डेरा है.
केवल;
एम्बुलेंस के दौड़ने
और
 पुलिस-सिटी की आवाज है.
यह
कुछ पलों की नहीं;
कोई
घंटा भर
 पहले की ही बात थी,
जब
सब ओर
लोगों की रेल-पेल थी.
रोज की तरह
 घर से
कोई  ऑफिस जाने को/
दुकान खोलने को/
स्कूल जाने को/
दूध लेन को/..............
किसी न किसी काम  से
घर से निकला था.
रोज की तरह कोई
बस पकड़ रहा था,
कोई मेट्रो की राह था.
पर......
दस बजे के आसपास
जब
भीड़ का उफान था,
शहर के
उसी व्यस्त चोराहे पर;
लगातार ब्लास्ट के धमाकों  ने
सब ओर
सन्नाटा दौड़ा दिया था.
अब;
न किसी कार/बस/मेट्रो
की विसिल सुनाई दे रही थी.
सब ओर;
केवल
 सिसकियों/ कराहों/ आहों का आर्तनाद था.
खून से सने चेहरे,
लहू से लथपथ शरीर;
यहाँ-वहाँ छितरे थे.
चौराहे पर लगी घड़ी में,
अभी भी
सुबह के दस बज रहे थे.

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